बुधवार, 1 जून 2016

बीहड़ में शाह की साइकिल

बीहड़ को दिल में संजोए वह बस्ती से आया है। जिस जमीन से उसका कोई नाता नहीं उसे वह अपनी कर्मभूमि बनाना चाहता है। फकीरों की सादगी लेकिन नाम शाह आलम। चंबल और उसकी सहायक नदियों के कई किलोमीटर में फैले बीहड़़ी जीवन के लिए वह कुछ करना चाहते हैं। नेताओं सा करना नहीं, बल्कि ऐसा करना जिसका वह कोई वायदा नहीं करते हैं लेकिन जानते हैं कि स्वाभिमान की इस भूमि के बारे में ऐसा कोई लिखित दस्तावेजी साक्ष्य नहीं जिसे शोध में संदर्भ के तौर पर इस्तेमाल किया जा सके।
जामिया मिलिया से एमफिल बीहड़ के महत्व को समझते हैं और समझते हैं यहां के बांकेपन को। यही कारण है कि शाह की साइकिल इन दिनों बीहड़ की पगड़ंडियों पर दौड़ रही है। शाह इन दिनों बीहड़ की यात्रा पर है जिसकी शुरूआत उन्होंने 29 मई को औरैया से की। मातृदेवी संस्था के संस्थापक और आजादी की अलख जगाने वाले पंडित गेंदा लाल दीक्षित की मूर्ति पर औरैया में माल्यार्पण कर अभियान की शुरुआत की गई।
यह भी गजब बात है कि जिस पंडित गेंदालाल दीक्षित के नाम पर औरैया की जनता अपने को क्रांतिकारियों की भूमि का प्रतिनिधि कहती है उन दीक्षित जी की क्रांतिकारी संस्था मातृदेवी का शताब्दी वर्ष है यह याद दिलाने के लिए शाह आलम को बस्ती से आना पड़ता है।
आलम के दिमाग में बीहड़ को लेकर बहुत कुछ चल रहा है। इस मुद्दे पर मेरी उनसे विस्तार से बात हुई। शाह इसके लिए मुझसे मिलने विशेष तौर पर आए। दरअसल शाह जिन मुद्दों पर काम करना चाहते हैं उन मुद्दों पर पिछले एक दशक से में काम कर ही रहा हूं। अब मुझे शाह के तौर पर एक साथी मिल गया है। काम तेजी से बढ़ेगा एेसी उम्मीद है। ------

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